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कब्रगाह बनती इमारतें, बेमौत मरते मजदूर


कहते है कि पिछली घटनाओं से सबक लेकर आने वाले भविष्य को सुरक्षित करना बुद्विमता होती है।मगर न तो लोग हादसों से सबक सीखते है और न ही प्रशासन जब हादसा हो जाता है तब सरकार व प्रशासन सक्रिय हो जाते है उसके बाद फिर वही परिपाटी चलती रहती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक ताजा घटनाक्रम में आखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स परिसर में निमार्णाधीन बर्न ओपीडी के बेसमेंट की मिटटी गिरने से दो मजदूरों की मौत बहुत ही दुखद है।लापरवाही करने वालों के खिलाफ सख्त कारवाई की जाए तो आने वाले समय में इन हादसों को रोका जा सकता है।देश में हर रोज मजदूर बेमौत मारे जा रहे है।दिल्ली में यह कोई पहला हादसा नहीं है इससे पहले देश में हजारों ऐसे दर्दनाक हादसे घटित हो चुके हैं। 31 दिसंबर 2015 को जम्मू के उधमपूर से 80 किलोमीटर दूर रामबन जिले के चंद्रकोट में जम्मू-कश्मीर हाईवे पर टनल कर्मचारियों की बैरक में आग लगने से दस श्रमिक जिंदा जल गए थे यह बैरक लोहे व फाईबर की बनी थी। इससे हादसे से पहले हिमाचल के बिलासपुर में एक सुरग में तीन मजदूर दब गए थे जिनमें दो लगभग 18 दिन बाद निकाले गए थे मगर तीसरे मजदूर का आज तक शव भी नहीं मिल पाया है।
विगत वर्ष गोवा के कनाकोना शहर में फिर एक निमार्णाधीन इमारत गिरने से 7 लोगों की मोैेत हो गई थी। और 40 से अधिक लोगों की इमारत के भितर दब गए थे जिन्हे काफी मशक्क्त के बाद बाहर निकाला था उसमें से कुछ मौत के मुह में समा गए और कुछ अपाहिज हो गए तथा दर्जनों लोग हादसे में जख्मी हुए थे यह हादसा कनाकोना शहर में घटित हुआ था जो राजधानी पणजी से 80 किलोमीटर दूर था। यह हादसा हुआ तब 40 लोग काम कर रहे थे इस घटना ने सवाल खड़े कर दिये हैं कि बार-बार हो रहे इन हादसों के कारण क्या है इस घटना ने यह प्रमाणित कर दिया है कि बीती घटनाओं से न तो सरकार ने सबक सिखा और न ही लोगों ने सीखा। पिछले कई सालों से ऐसे दर्दनाक हादसे हो रहे हैं लोग इमारतों में जमीदोज हो रहे है।




आंगड़ो पर गौर किया जाए तो गत वर्ष 2013 में महाराष्ट्र के ठाणे में सात मंजिला इमारत ढहने से 75 लोगों की असमायिक मौत और 60 के लगभग घायल हो गए थे।यह इमारत ताश के पतों की तरह ढह गई थी यहां ज्यादातर मजदूर ही रह रहे थे ।यह बहुत ही दर्दनाक हादसा था। जिसने एक साथ इतने लोगों को लील लिया था । भले ही प्रशासन मुआवजे का मरहम लगाता है मगर जो बेमौत मारे जाते है क्या वे लौट आएगें यह एक यक्ष प्रशन बनता जा रहा है अगर प्रशासन ने पहले इस पर कार्यवाही की होती तो इतना बडा मंजर टल सकता था इस इमारत में 35 परिवार रह रहे थे लेकिन उन्हे इस बात का इल्म भी नहीं होगा कि एक दिन यही इमारत मौत की कब्रगाह बन जाएगी । इसे प्रशासन की घोर लापरवाही कहना गलत नहीं होगा ।2013 में हिमाचल प्रदेश के मण्डी में भी एक इमारत के ढह जाने से एक भिखारी महिला दब गई थी जिसे पुलिस व प्रशासन की मदद से चार दिन बाद मलबें के ढेर से जिन्दा निकाल दिया था। गत बर्ष हिमाचल के उना में भी एक स्कूल की दीवारें गिरने से एक बच्चे की मौत हो गई थी और दर्जनों घायल हो गये थे। सरकार ऐसी घटनाओ के बाद मुआवजों की घोषणा करने तथा जांच के आदेश देने में देरी नहीं करती लेकिन यदि पहले ही इन लोगों पर करवाई कर ली जाए तो ऐसे हादसे रुक सकते है मगर सरकारों की तन्द्रा तो हादसे के बाद ही टूटती है। आखिर कितने हादसों के बाद प्रशासन अपनी जिम्मेवारी निभायेगा इस प्रशन का जबाब सरकार को देना होगा। इमारतो का निर्माण करने वाले ठेकेदारों को सजा ए मौत देनी चाहिए जो इन हादसों के लिये प्रत्यक्ष रुप से जिम्मेवार है।जो चंद चादी के सिक्कों के की चाहत के लिए लोगों की जिन्दगियां ले रहे हैं ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ा संज्ञान लेना चाहिए जो मानव की जान लेने से भी नहीें हिचकचाते ऐसे जल्लादों को सरेआम फांसी देनी चाहिए।


देश में प्रतिदिन ऐसे ममार्तंक हादसे होते है मगर प्रकाशमें नहीं आते।इमारतों का निर्माण करने वाले तथाकथित ठेकेदारों के लाईसैसं रद्द करने चाहिए इन्हे ब्लैक लिस्ट करना चाहिए तथा इनके खिलाफ अपराधिक व जानबूझकर हत्याओं का मामला दर्ज करना चाहिए।सरकारोंं को भी समय-समय पर निर्माणधीन इमारतों का निरीक्षण करते रहना चाहिए तथा इन इमारतों में लगाया जा रहा सीमेंट की गुणवता भी जांचनी चाहिए ताकि घटिया सामग्री से बन रही इमारतों का निर्माण कार्य समय पर रोका जा सके और हादसों को टाला जा सके। इन हादसों में सैंकड़ों बच्चे अनाथ हो गए और कई मां-बहनों का सिदूर मिट गया और बहनों के भाई मारे गए।केन्द्र सरकार को इन हादसों के संदर्भ में छानबीन करवानी चाहिए तथा दोषियों को सजा देनी होगी। समय रहते इन घटनाओं को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने होगें ताकि भविष्य में ऐसी दर्दनाक हादसों पर विराम लग सके।अगर अब भी सरकार ने लापरवाही बरती तो बहुमंजिला इमारतें कब्रगाहों में तब्दील होती रहेगीं और निदोर्ष लोग व मजदूर बेमौत मरते रहेगें।

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