सारे कायदा-कानून को ताक पर रखा
दिल्ली सरकार के श्रम विभाग ने एक यूनियन को पंजीकृत करने में सारे कायदा-कानून को ताक पर रख दिया। पूरी तत्परता दिखाते हुए एक सप्ताह में पंजीकरण भी कर दिया। उसके पदाधिकारियों को ऐसे अधिकार भी सौंप दिए जो केवल सरकारी अधिकारी के होते हैं। इसके साथ ही यूनियन भी निर्माण मजदूरों को उस वक्त के प्रमाणपत्र जारी कर रही है जब उसका अस्तित्व ही नहीं था। इसके चलते चर्चा है कि आम लोगों की सरकार में यह काम किसके दबाव में अधिकारियों ने किया है।
श्रमिक विकास संगठन को ट्रेड यूनियन के तौर पर पंजीकरण कराने के लिए 23 जून 2015 को स्टेट बैंक आफ इंडिया की पुराना सचिवालय स्थित शाखा में फीस जमा की गई। 29 जून 2015 को उप-पंजीकार ट्रेड यूनियन कार्यालय ने पंजीकरण प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया। पंजीकरण के लिए यूनियन के संविधान में स्पष्ट है कि यूनियन का कार्यक्षेत्र केवल दिल्ली तक सीमित है, लेकिन इसके पदाधिकारी नोएडा व उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के पते से शामिल किए गए हैं। गाजीपुर दिल्ली सरकार के एक मंत्री का गृह जनपद है। नियमों के मुताबिक केवल दिल्ली को ही अपना कार्यक्षेत्र दर्शाने वाले संगठन के सभी पदाधिकारियों के लिए दिल्ली का पता होना जरूरी है।
इसी प्रकार यूनियन की कार्यकारिणी समिति में सभी पदाधिकारी हैं। कोई कार्यकारिणी सदस्य नहीं है। इन पदाधिकारियों में से तीन सामाजिक कार्यकर्ता, चार इलेक्ट्रीशियन और दो इंटीरियर वर्क से जुड़े हुए दर्शाए गए हैं। इनमें से एक भी निर्माण मजदूर के कार्य से जुड़ा हुआ नहीं है मगर दिल्ली में पहले ही निर्माण मजदूरों के लिए काम कर रही यूनियनों को दरकिनार करते हुए इस नव गठित यूनियन के अध्यक्ष को ही निर्माण मजदूर बोर्ड का सदस्य बना दिया गया।
इस यूनियन के महासचिव को श्रम विभाग ने लिखित फरमान जारी कर दिल्ली में मजदूरों के पंजीकरण शिविर लगाने के लिए एकमात्र नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। उसे यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। उसे सत्ताधारी दल का वालंटियर भी बताया जा रहा है। इस फरमान में साफ तौर पर कहा गया है कि इसी व्यक्ति के आदेश पर निर्माण मजदूरों से जुड़े तमाम कार्य होंगे।
चौंकाने वाला पहलू यह भी है कि ट्रेड यूनियन के रूप में इसका पिछले वर्ष जून के अंत में पंजीकरण हुआ मगर वह निर्माण मजदूर बोर्ड में मजदूरों के पंजीकरण के लिए मजदूरों को एक साल में 90 दिन से अधिक कार्य करने का प्रमाण पत्र दे रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि जिस अवधि में संगठन पंजीकृत ही नहीं था आखिर उस अवधि के लिए जारी किए जा रहे उसके प्रमाण पत्रों को मान्यता निर्माण मजदूर बोर्ड में बैठे अधिकारी किस आधार पर दे रहे हैं।
इसके पीछे खेल तो नहीं
निर्माण मजदूर बोर्ड में मजदूर का पंजीकरण कराने के लिए संबंधित यूनियन को प्रति मजदूर पहले 50 रुपये की प्रोत्साहन राशि मिलती थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 100 रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा यूनियन संबंधित निर्माण मजदूर से भी प्रवेश शुल्क व सदस्यता शुल्क आदि के रूप में इतनी ही रकम ले लेती हैं। बोर्ड और मजदूर से मिलने वाली यह रकम प्रति माह लाखों में बैठती है। चर्चा यह है कि ईमानदारी का चोला पहन सरकार में बैठे कुछ लोगों ने कमाई के लिए तो अलग से यह रास्ता नहीं निकाल लिया है। प्रोत्साहन राशि 50 रुपये से बढ़ाकर 100 रुपये करने की घोषणा को तो अधिसूचित कर कानूनी जामा पहनाना दिया गया मगर श्रमिक विकास मिशन के तहत छत्रसाल स्टेडियम में मुख्यमंत्री अर¨वद केजरीवाल की ओर से बोर्ड की योजनाओं में की गई आर्थिक बढ़ोतरी का आज तक गजट नोटिफिकेशन नहीं हुआ है।
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