किसके लिए सुधार और किसकी सहूलियत (मिकिन कौशिक)
नई दिल्ली, पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आने के बाद मोदी सरकार आर्थिक सुधारों से संबंधित कुछ बड़े और कड़े फैसले लेगी, जिसमें सबसे बड़ा होगा श्रम कानूनों में सुधार। सुधारों का सीधा सीधा अर्थ देश के कठोर श्रम कानूनों को लचर बनाने से है गौरतलब है कि भारत के श्रम क़ानून विश्व भर में कठोर श्रम कानून में गिने जाते है बेशक ये श्रम विभाग के ढीले और उदासीन रवैये से लागू न हो पाते हों इनका ढुलमुल रवैया की वजह भ्रष्टाचार है या क्या ये किसी से छिपा नहीं है
देखते है कि सरकार आर्थिक सुधार के नाम पर श्रम कानूनों में क्या मुख्य बदलाव करने जा रही है
- हायर एंड फायर की नीति : इसके तहत कंपनियों को उत्पादन कार्य को हिसाब से कर्मचारियों की छंटनी करने की छूट मिलेगी।
- विदेशी निवेश : इसके अलावा सरकार 5 सेक्टरों में एफडीआई नियमों में छूट देने जा रही है। ये वे क्षेत्र है जिनहे पूर्व सरकारों ने विदेशी निवेश से दूर रखा गया था इसमें प्रिंट मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करना शामिल है। साथ ही, रिटेल में विदेशी निवेश की शर्तों में ढील दी जा सकती है, जिसके तहत विदेशी निवेश वाले फूड स्टोर में होम केयर प्रॉडक्ट रखने की इजाजत भी दी जा सकती है।वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, ये सभी परिवर्तन 5 राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद अगले कुछ हफ्ते इकनॉमिक रिफार्म के मद्देनजर काफी हलचल भरे रहने वाले हैं। इन आर्थिक सुधारों से जुड़े कदमों की रूपरेखा मोदी सरकार ने तैयार कर ली है। सरकार इन कदमों की घोषणा चुनावी नतीजों के बाद करेगी। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इन सुधारों पर चुनावी नतीजों का कोई असर नहीं होगा। सरकार ने पहले ही इनके बारे में रूपरेखा तैयार कर दी थी। चुनाव के आचार संहिता के कारण इन फैसलों को अभी तक टाला गया।सरकार के अनुसार, आर्थिक सुधार से जुड़े कदमों को लेकर उद्योगों और मजदूर संगठनों के लोगों के साथ बातचीत हो चुकी है। हालांकि, मजदूर संगठनों ने लेबर रिफॉर्म को लेकर विरोध समेत अपनी आशंकाएं जाहिर की हैं। किन्तु सरकार इन श्रम कानूनों को बदलने का पूरा मूड बना चुकी है तथा सरकार इन आशंकाओं को दूर करते हुए वह अपना अंतिम फैसला लेगी।
वहीँ श्रम मंत्री बंडारु दत्तात्रेय का कहना है कि हमारे लिए मजदूरों के हित सर्वोपरि हैं। ऐसे में हर फैसले में उनके हितों का ध्यान रखा जाएगा। लेबर रिफॉर्म के तहत सरकार की 44 श्रम कानूनों को 4 आसान लेबर कोड में बदलने की योजना है।
यूनियन बनाना होगा कठिन, बिना बताये दिखा दिया जाएगा घर का रास्ता
मजदूर अपनी आवाज न उठा सके, किसी तरह का संघर्ष न कर सके इसकी तैयारी पहले से ही की जा चुकी है आने वाले इन नए कानूनों के तहत छोटी फैक्ट्रियों के कानून के जरिये 14 से कम कर्मचारियों के लिए यूनियन बनाना मुश्किल हो जाएगा और 300 तक कर्मचारियों वाली कंपनियों में बिना अनुमति छंटनी हो सकेगी।
श्रमिकों के हित में श्रम कानूनों में बदलाव की बात करने वाली ये सरकार आर्थिक सुधार करना चाहती है या कारोबारियों को सहूलियत देना चाहती है, एक और जहाँ पूरे भारत में आय में घोर असमानता है पूंजी का एकीकरण हो रहा है तथा कुछ चंद लोगो के पास पूँजी का भण्डार हो रहा है और निर्धन वर्ग और अधिक निर्धन बनता जा रहा है, यदि सरकार इस स्थिति को दूर करना चाहती है तो इसका उपाय श्रमिको को दबा कर और निजीकरण, व् विदेशी निवेश से नहीं बल्कि उनको सहकारी रूप से और अधिक सुविधाए और अधिक से अधिक वेतन प्रदान कर ही किया जा सकता है, अभी तक देश में श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा तक पर्याप्त रूप से हम प्रदान नहीं कर पाए है उस पर ये सभी बदलाव श्रमिकों की स्थिति को और अधिक कमजोर कर देंगे| देश में बेरोजगारी जो एक विकत समस्या है चाहे सरकार कुछ भी कहे लेकिन देश में प्रच्छन्न बेरोजगारी चरम पर है देश में तकनीक और कौशल का ढिंढोरा पीता जा रहा है जगह जगह कौशल विकास केंद्र खोले जा रहे है लेकिन जो पहले से कुशल है तकनीक में दक्ष है उनकी उपेक्षा की जा रही है देश में बी. टेक एम्. टेक बेरोजगार है या फिर आठ से दस हजार की नौकरी करने के लिए मजबूर है, लेकिन इस बेरोजगारी को दूर करने की बजाय यहाँ ध्यान अपने छिपे एजेंडे को पूरा करने पर लगा हुआ है |
मिकिन कौशिक
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